Friday, December 18, 2009

"जिन्दगी और इंसान की पल पल बदलती सच्चाई"

"वफाओं से तौबा"
 अक्सर ऐसा होता है कि भूल जाते हैं लोग,
करीब आकर ही दूर जाते है लोग.
वादा करते हैं उम्र भर साथ निभाने का,
फिर इतनी जल्दी क्यों बदल जाते है लोग.
वक़्त गुजरता रहता है अपने रोते रहने से,
इतना गम सहकर भी कैसे हंस लेते है लोग.
ऐ-संजू दिल लगाता है बार बार क्यों,
एक दिन बेगाने हो जाते हैं अपने ही लोग.
अब मैं नहीं "हम" 

"अपनों में परायापन"
 अपनेपन का कुछ यूं सिला देते है लोग,
बिठाकर पलक पर ख़ाक में मिला देते हैं लोग.
बड़े ख़ुलूस से देते हैं दावत-ए-मोहब्बत,
और ज़हर चुपके से नफरत का पिला देते हैं लोग.
दोस्त बनकर पहले तो आँखों में बसाते है अपनी,
फिर नज़रों से यूं ही गिरा देते हैं लोग.
वफ़ा का वास्ता देकर पहले जी भर पिलाते हैं मयखाने में,
फिर इल्जाम ज़माने भर के लगा देते हैं लोग.
लफ्ज मिलते नहीं जो हाल-ए-दिल कह दे सबसे,
इसलिए हर बात का अफ़साना बना देते है लोग.
हमने देखा है जिंदगी को करवटें बदलते,
पाँव मौत के भी हिम्मत से हिला देते है लोग.
अपनेपन का कुछ यूं सिला देते है लोग....
अब मैं नहीं "हम" 

"आज का इंसान और इंसानियत"
जिंदगी मुझको मिली श्मशान में,
पाई हैं खुशियाँ मैंने अपमान में.
दर्द पत्थरों से मिला हैं मुझको,
मगर न मिली इंसानियत इंसान में.
पाठ पढ़कर सभ्यता का जग में,
बढ़ गया पत्थर भी अब भगवान में.
लाश के नज़र में किन्तु आज देखो,
घिर गया इंसान ही शैतान में.
छा रही हरियाली रेगिस्तान में,
जग रहे मुर्दे कब्रिस्तान में,
जानवर भी जानते है प्रेम को,
पर ना आई सभ्यता इंसान में.
पर ना आई सभ्यता इंसान में.
अब मैं नहीं "हम"





~ विचार : जो युग परिवर्तन कर दें ~
18 -दिसम्बर-2009


" मनुष्य परिस्थतियों का दास नहीं, अपितु उसका, निर्माता, नियंत्रनकर्ता और स्वामी है.."                    पं. श्री राम शर्मा आचार्य