Tuesday, March 16, 2010

~विचार : जो युग परिवर्तन कर दें ~
16 मार्च 2010 
"किसी का सुधार उपहास से नहीं, बल्कि उसे नए सिरे से सोचने और करने का अवसर देने से होता है."    पं श्री राम शर्मा आचार्य

Monday, March 15, 2010

नारी ही यदि है अज्ञान, तो देश कैसे बने महान

       आज कल एक चर्चा हर किसी के बीच बहस बन जाती है, माहिला आरक्षण बिल का नाम लेते ही हमारे लोक प्रतिनिधियों यानी सांसदों में कहा सुनी हो जाती है. लेकिन एक बात जो मैं सोचता हूँ कि क्या वाकई इस मुद्दे पर इतना बवाल होना जरूरी है..., क्या इस मुद्दे पर लोकतंत्र को तार तार करना जरूरी है. क्या किसी ने इस बेबुनियादी बवाल में शामिल होने से पहले, समाज में होने वाले इस ऐतहासिक बदलाव के क्षणों से सुनहरे भविष्य की आहट महसूस की..? और इस आहट को महसूस करने के लिए हमें जड़ों से पत्तो तक का सफ़र करनाहोगा.

       महिला, स्त्री ये शब्द सुनते ही हर किसी के जेहन बहुत सी तस्वीरें बनकर उभरती है, कोई आधी आबादी की व्याख्या रुपी गहराई में चला जाता है, तो कोई काम के वासना रूप को सोचने लगता है...तो कोई उसके पावन रूप पत्नी, बीवी, बहन के बारें सोचने लगता है. लेकिन हम उसे किसी भी रूप में देंखे, एक सम्मान कहीं न कहीं, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मन में उभर ही आता है. वो बात अलग है कि समाज के दृष्टिभ्रम ने उसको उसका सम्मान देने के बजाय उसे एक उपभोग समझकर अपमान के कडवे घूँट पीने के लिए पग पग पर मजबूर किया, और आज उसी मजबूरी को महिलाओ का शसक्त शस्त्रीकरण का हाथियार बनाने का प्रयास किया जा रहा है. और महिला आरक्षण बिल को इसी महाभियान के तहेत पहली पूर्णाहूति माना जा सकता है.
लेकिन हमारे कुछ महत्वाकांक्षी नेता...जो इस पवित्र और सार्थक पहल में अपना रोड़ा अटकाने का प्रयास कर रहे है, क्या उन्हें इतना भी याद नहीं कि जिनके आरक्षण के लिए वो विरोध कर रहे है, आज उनका अस्तित्व उन्ही के अक्ष की देन है. क्या वो पल भर के लिए भी ये सोचने का प्रयत्न नहीं करते कि जब समाज में हमेशा उपेक्षाओ का सामना करते करते नारी ने इस सृष्टी को ऐसे ऐसी महान विभूतिया दी है जिनके अनुसरण ये समाज आगे बढ़ता है, अगर उन्हें एक अंश के रूप में भी समाज में उच्च स्थान दिया जाएगा तो वही नारी हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति को कितने और रत्न देगी. परन्तु सत्ता की अंधी दौड़  में जो परिवार तक को भुला बैठा है, उसे भला समाज के स्वर्णिम भविष्य से क्या लेना देना. उसे तो केवल अपने हिस्से की स्वार्थ की रोटियां चाहिए. लेकिन इस पूरे प्रकरण मैं कोई भी चाहे कुछ भी करें या कहें पर एक बात हमेशा ध्यान रखने की है..वो ये कि... 

"नारी इस ब्रह्माण्ड और सृष्टी की जनक और पोषक दोनों ही है, या यूं कहें हर मानव, हर परिवार, हर समाज और हर राष्ट्र की नीव नारी है, अगर हम अपनी नीव को मजबूत करने में सहयोगी बनेंगे तभी हमारा भविष्य भी मजबूत होगा, और इतिहास गवाह है की जब - जब नारी को अपनी योग्यता दिखाने का मौका मिला है , तब तब उसने अपने आप को पुरुषों से भी श्रेष्ठ प्रस्तुत किया है. चाहे वो लक्ष्मी बाई हो, पन्नाधाय हो, मदर टेरेसा हो या इंदिरा गाँधी...!! इसलिए मेरी अपने भारतवासियों और और उन् लोगो से, जो भी मेरा ब्लॉग पढ़ते है , उनसे ये निवेदन है कि इस ऐतहासिक पहल का खुलकर समर्थन करें, और हमारे भारत को समुन्नत राह की और अग्रसर करने में अपना छोटा ही सही मगर महत्त्वपूर्ण योगदान निभाएं."
~नारी ही यदि है अज्ञान, तो देश कैसे बने महान~

तो बस 
"अब मैं नहीं हम"

~विचार : जो युग परिवर्तन कर दें~
15 - मार्च-2010 

जीवन में ऊंचा उठने के चार सूत्र :-
 > ईमानदारी
> समझदारी 
> जिम्मेदारी
> बहादुरी
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

Friday, March 12, 2010

~ विचार : जो युग परिवर्तन कर दें ~
11-मार्च 2010 
"अधिकार नहीं, कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहे."

Thursday, March 11, 2010

~ विचार : जो युग परिवर्तन कर दें ~
11-मार्च 2010 
"इस बात का महत्व कम है कि  हमें विरासत में क्या मिला, बल्कि महत्व इस बात का है कि हम विरासत में क्या छोड़ कर जायेंगे, इसलिए स्वयं अपनी विरासत का निर्माण करें."

Wednesday, March 10, 2010

"हर लम्हा हमारा है- हर कण हमारा है "

          कुँए में पानी के छोटे छोटे स्रोत इधर उधर से आकर गिरते है और उन्ही नगण्य सी इकाइयों के अनुदान से बना यशस्वी कुआँ असंख्य मनुष्यों, प्राणियों, वनस्पतियों की प्यास बुझाते रहने में असमर्थ होता है. कुँए का सारा यश उन जल धमनियों के आत्मदान का प्रतिफल है. यदि वे संकीर्ण होती, अपना बचाव सोचती, अपनी संपत्ति को मुफ्त में देने से कतराती तो इस संसार में एक भी कुआँ न बन सका होता और यहाँ सब कोई कभी के प्यास में तड़पकर अपना अस्तित्व गवां चुके होते.          
          संसार की सुख शांति, समृद्धि औत सुन्दरता एक यशस्वी कुँए की तरह हैं, जिसे सजीव रखने के लिए कुछ जल धमनियों का, उत्क्रष्ट आत्माओं का निरंतर अनुदान मिलते रहना आवश्यक है. इन दिनों भारी दुष्काल इसी सत्प्रवृत्ति में पड़ गया है. लोग अपनी व्यक्तिगत तृष्नाओं की पूर्ति में सिर से पाओं तक डुबे पड़े है. दान, पुण्य, पूजा-पाठ के नाम पर राई रत्ती जैसे उपकरण इस आशा में खरच करते है, कि एक अगले ही दिनों वह लाखों करोड़ों गुना होकर उन्हें मिल जाएगा. अविवेकी नर-पशु इस स्तर के हो तो बात समझ में आती है, पर भक्तिज्ञान, अध्यात्म, वेदांत, ब्रह्मज्ञान, तत्वदर्शन जैसे विषयों पर भारी माथापच्ची कर सकने में समर्थ लोग जब इस कसौटी पर कसे जाते है कि उनका अनुदान समाज के लिए क्या है..? तो उत्तर निराशा जनक ही मिलता है. ऐसा ब्रह्मज्ञान भला किसी का क्या हित साधन करेगा जिसने मनुष्य के हृदय में इतनी करुणा एवं श्रद्धा उत्पन्न न की हो कि विश्वमानव को उसके अनुदान कि महत्ती आवश्यकता है और वह उसे देना ही चाहिए.
          यहाँ ये बात स्मरण रखने योग्य है कि इस पूरी प्रकृति का चक्र एक दूसरे पर निर्भर है...जैसे समुद्र से बादल बनते है, बादल से वर्षा होती है, वर्षा से छोटी छोटी नदियाँ बनती है, और नदियों से समुद्र बनता है. ठीक इसी प्रकार पेड़ मनुष्य को ऑक्सिजन देते है, और मनुष्य द्वारा पेड़ों को कार्बन डाई ऑकसाईड मिलती है.
          इसलिए,
मानव होने का सही अर्थ यही है कि पृथ्वी पर उस परमात्मा द्वारा बनाये प्रकृति के अनमोल आपसी देने और लेने कि सुन्दर प्रक्रिया में अपने जीवन का सार ढूढने की कौशिश करें...इसके बाद "हर लम्हा हमारा है- हर कण हमारा है और हम उन् लम्हों के है-हम उन् कणों के हैं " .
~!!...यही मनाव जीवन के सारगर्भित हर अक्ष की दास्ताँ है...!!~

अब मैं नहीं "हम"
~ विचार : जो युग परिवर्तन कर दें ~
10-मार्च 2010 
"लोकमंगल की सर्वकल्याणकारी सत्प्रवर्त्तियों से ही किसी व्यक्ति, देश, धर्म, समाज तथा संस्कृति की उत्कृष्टता नापी जा सकती है. खरे खोटे की पहचान भी इसी आधार पर होती है."                                                       पं. श्रीराम शर्मा आचार्य